Showing posts with label Poetries. Show all posts
Showing posts with label Poetries. Show all posts

Thursday, February 7, 2013

जागते ख्वाब...

मैनें लोगों को रातो-रात सफल होते देखा था,
पर किस्मत रूठने की वकालत कभी ना थी...
मैनें जागती आँखो से ख्वाब ज़रूर देखा था,
पर उनके टूटने की इबादत कभी ना थी...

Friday, November 4, 2011

माँ...

माँ, तू क्यूँ है चिंतित,
मन तेरा किधर खो रहा...
मत सोच, उस संसार के लिए,
दुख-रोष जहाँ व्याप्त हो रहा...

नित सबेरे कोमल हाथो सें,
तुझको मैं जगाऊँगी...
नन्हें कदमों और किल्कारी से,
घर आँगन महकाऊँगी...

जल्दी दे दो दूध-बिस्कुट,
मैं बड़ी हो जाऊँगी...
खुश कर तेरे इस हृदय को,
सुंदर "परी" कहलाऊँगी..

~ तविषी बजाज

Thursday, September 15, 2011

उम्मीद...

"उम्मीद" अंधेरे मे जलती एक ज्योति है...
"उम्मीद" एक लंबी राहत पाने की चुनौती है..

"उम्मीद" बेहतर दिनों का सपना है..
"उम्मीद" जुनून भरा दिल अपना है...

"उम्मीद" रेगिस्तान में एक तालाब है...
"उम्मीद" धूल-मिश्रित मोती बेहिसाब है...

"उम्मीद" हर जगह है...
"उम्मीद" हर किसी के लिए है...

"उम्मीद" ज़िंदगी में एक चमत्कार है...
"उम्मीद" है तभी तो जीवन में बहार है...

© - सौरभ बजाज

Wednesday, August 24, 2011

ख्वाबों की दुनिया...

ख्वाबों की दुनिया होवे रंगीन,
ज़िराफ़ से ऊँचे, चींटी से महीन,
कोई वानर सी चपलता सिखलाए,
तो कुछ वफ़ादारी-ए-श्वान निभाए...

कदा मन हो मदमस्त गज-राज,
और बिरले भयभीत करे वनराज,
इसलिए कहे कवि 'बजाज',
हर ख्वाब के हो अपने मिज़ाज.

© - सौरभ बजाज

Wednesday, August 17, 2011

महा-प्रीत...

लिखना चाहे इक मधुर गीत...
जो बयाँ करे ये महा-प्रीत...
पर शब्दों से परे ये रीत...
हर कोई पाए अपना मन-मीत...
© - सौरभ बजाज



Sunday, August 7, 2011

मित्रता दिवस...

आँख खुली तो आपकी याद आई,
कुछ खास संदेशा ये सुबह लाई,
दुख-सुख की घड़ी जिन्होने संग निभाई,
ऐसे सभी दोस्तो को मित्रता दिवस की बधाई...

Wednesday, July 27, 2011

वर्षा ऋतु...

नील-निर्मल स्वच्छ गगन...
बहती भीनी-सी मंद पवन...
तब बादलों का करके सृजन...
वर्षा ऋतु का हो प्रकटन...

जल-नभ-धरा करे अदभुत मिलन...
जब गर्जन-तर्जन मय हो वर्षण...
फिर उपस्थिति दर्ज कराए जल-कण...
अंततः कर सब को सतरंगी नमन...


© - सौरभ बजाज
 The beautiful Indian Ocean... Clicked @ Bel Ombre, Mauritius...

Monday, July 25, 2011

साथी...

ताउम्र साथ निभाने का वादा करते हैं...
फिर भी साथी छूट जाते हैं...
कुछ तो सीखें हम इन निरीह प्राणियों से...
जो अपनो के लिए सदा आगे आते हैं...
 © - सौरभ बजाज
 Clicked in Mauritius, a 150+ year old tortoise couple...!!!

Sunday, July 24, 2011

हमराज़...

हर पल एक एहसास है वो...
जिंदगी के लिए कुछ खास है वो...
'प्रिया' बुलाते प्यार से जिसे...
मेरी ज़िंदगी की हमराज़ है वो...
© - सौरभ बजाज

Friday, July 22, 2011

कातिल इरादे...

कितने कातिल है तेरे इरादे,
ये हमें मालूम नहीं...
बस तेरी पलकें झुकती हैं,
और हम मर जाते है...
© - सौरभ बजाज

Wednesday, March 2, 2011

उज्जैन की यादे...

आओ लौट चले उन पिछली यादों में...
जीया करते थे जब हम उन्मादों मे...

याद आती है क्षिप्रा नदी की शाम...
और वो मेघदूत की पार्टी में झाम...

चौपाटी पर करने को जाते सब सैर...
नयन-सुख उठाए और लौटे खाए बगैर...

याद आती है डालु की कचोरी-चाय...
1-1 रुपये का जब हिसाब मिलाए...

और कुछ ना मिले अपने कॅंटीन मे हाय...
पूरन और कालू के ताज़े समोसे खाए...

शिवानी भी हमें बहुत याद आए...
वही थी जो हमें पास करवाए...

हर पेपर के बाद महाकाल जाए...
और किसी को वही अकेले छोड़ आए...

रिज़ल्ट के पोहे महीनो बाँटे जाए...
जो उम्मीद ना हो वैसे नंबर पाए...

कुछ ऐसी ही उज्जैन की यादे सताए...
क्यूँ ना फिर सब मिल ये दोहराए...

द्वारा - सौरभ बजाज 

Thursday, December 2, 2010

कुछ तुम कहो... कुछ हम कहे...

कुछ तुम कहो...
कुछ हम कहे...
सिलसिला सदा चलता रहे..
है फिर भी कितनी...
अनकही बाते...
हर पल मन मचलता रहे..
दूर हो हम...
या पास रहे...
दिल तो फिर भी तड़पता रहे...
कुछ तुम कहो...
कुछ हम कहे...
सिलसिला सदा चलता रहे..

द्वारा - सौरभ बजाज

Tuesday, April 27, 2010

अन्तर्व्यथा...

अंतर्मन की गहराई मे झाँक तो तू जरा,
कितना द्वेष, छल-कपट इसमे है भरा,
हर कोई हैं सिर्फ़ स्व-सम्मान से ही घिरा,
परंतु दूसरो की परवाह करे कोई निरा...
 
अथाह दुख और पीड़ा से भरा ये संसार,
कर रहा हर मानव-अंश हाहाकार,
सुनो जरा अपने मन की चीत्कार,
किसी पर क्यूँ करे अब कोई ऐतबार ??? 

~ सौरभ बजाज

Tuesday, March 9, 2010

और दूँ मैं बस मुस्कुरा...

कभी समझो तुम कुछ नही..
और करता रहूँ मैं बाते अथाह...
कभी ना कहूँ मैं कुछ...
फिर भी चाहो तुम समझना...
हर पल करो कोशिश जानने की ...
और पाओ खुदको उसी उलझन मे उलझा...
कभी लगे तुम जानो सब कुछ...
जैसे तुम हो खुदा...
और कभी तुम ना करो
बिल्कुल भी मेरी परवाह...
बैचैन होकर तुम कहो मुझे पागल
और दूँ मैं बस मुस्कुरा...

कभी मैं कहूँ तुमसे बहुत कुछ...
ना जानू खुद उसका फलसफा...
पर हर उस बात में जो मैं लिखूं..
है मेरे मन की अवस्था...
और हर वो बात जो मैं कहूँ...
वो है मेरे मन की व्यथा...
तुम जानना चाहो उसे...
पर देख ना पाओ वो पूरा जलसा...
तुम देखो मेरे वो छिन्न भिन्न स्वरूप..
और पाओ खुद को ठगा हुआ...
बैचैन होकर तुम कहो मुझे पागल
और दूँ मैं बस मुस्कुरा...

कभी ना दूँ मैं तुम्हारे सवाल का जवाब...
और कभी करूँ तुम्हे गुमराह...
हैरान से तुम सोचो...
कैसा है ये इनसाँ...
कभी लगूँ मैं श्रांत पथिक...
कभी लगूँ मैं उत्सुक इंसान..
कभी लगूँ मैं संतुष्ट प्राणी...
कभी लगूँ मैं जिद्दी शैतान...
कभी लगूँ मैं एकदम परिपक्व...
कभी लगूँ मैं बिल्कुल नादान...
न तुम जानो कैसे समझो मुझे...
और स्वीकारो अपनी विफलता...
बैचैन होकर तुम कहो मुझे पागल
और दूँ मैं बस मुस्कुरा...

ख़त्म होगा ये खेल तब...
जब शायद मैं थक जाऊँ...
या ख़त्म होगा ये तब...
जब शायद तुम चले जाओ...
तब तक हर साँस मे...
मुझे पाओगे तुम...
हर कहे लफ़्ज मे ...
अपना एहसास पाओगे तुम...
जानते हो की ये पहेली...
रहेगी अब उनसुलझी सदा...
फिर क्यों तलाश कर रहे...
हम अपनी ज़िंदगी का फलसफा...
बैचैन होकर तुम कहो मुझे पागल
और दूँ मैं बस मुस्कुरा...

द्वारा - सौरभ बजाज

Monday, February 8, 2010

मैंने शांति नहीं जानी है ...

मैंने शांति नहीं जानी है  !
त्रुटि कुछ है मेरे अन्दर भी ,
त्रुटि कुछ है मेरे बाहर भी ,
दोनों को त्रुटि हीन बनाने की मैंने मन में ठानी है  !
मैंने शांति नहीं मानी है !
 
आयु बिता दी यत्नों में लग ,
उसी जगह मैं , उसी जगह जग ,
कभी - कभी सोचा करता अब , क्या मैंने की नादानी है  !
मैंने शांति नहीं जानी है  !

पर निराश होऊं किस कारण ,
क्या पर्याप्त नहीं आशवासन ?
दुनिया से मानी , अपने से मैंने हार नहीं मानी  है  !
मैंने शांति नहीं जानी है

- हरिवंश राय बच्चन

Tuesday, January 19, 2010

संवेदना...

यह एल्बम मेरे लिए कुछ ख़ास हैं क्योंकि इसमे समाविष्ट है एक कवि के सोचने की दृष्टि, एक कवि का हृदय और एक कवि की संवेदना. यह गीत इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसमे उन सभी लोगो का समागम है जिन्हें मैं हमेशा से चाहता रहा हूँ - अटलजी, अमिताभ बच्चन, जगजीत सिंग और शाहरुख ख़ान...

ज़िंदगी की शोर, राजनित की आपाधापी, रिश्तों नातो की गलियों और क्या खोया क्या  पाया के बाज़ारो से आगे, सोच के रास्ते पर कहीं एक ऐसा नुक्कड आता है जहाँ पहुँच कर इंसान एकाकी हो जाता है. तब, जाग उठता है एक कवि. फिर शब्दों के रंगों से जीवन की अनोखी तस्वीरें बनती हैं, कविताएँ और गीत, सपनों की तरह आते हैं और काग़ज़ पर हमेशा के लिए अपना घर बना लेते हैं.

अटल जी की ये कविताएँ, ऐसे ही पल, ऐसे ही क्षणो में लिखी गयी हैं, जब सुनने वाले और सुनाने वाले में, तुम और मैं की दीवारें टूट जाती है, दुनिया की सारी धड़कने सिमट कर एक दिल में आ जाती हैं, और कवि के शब्द दुनिया के हर संवेदनशील इंसान के शब्द बन जाते हैं.


क्या खोया, क्या पाया जग में
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!

जन्म-मरण का अविरत फेरा
जीवन बंजारों का डेरा
आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
कौन जानता किधर सवेरा
अंधियारा आकाश असीमित,प्राणों के पंखों को तौलें!
अपने ही मन से कुछ बोलें!


Saturday, January 16, 2010

अब मुझे कोई इंतेज़ार कहाँ...

जिन दिनो आप थे, आँख में धूप थी...
जिन दिनो आप रहते थे, आँख में धूप रहती थी...
अब तो जाले ही जाले हैं, वे भी जाने वाले हैं...
वो जो था दर्द का क़रार कहाँ...
वो जो था दर्द का क़रार कहाँ...
अब मुझे कोई इंतेज़ार कहाँ...
वो जो बहते थे आब्शार कहाँ...
अब मुझे कोई इंतेज़ार कहाँ...

Friday, January 1, 2010

New Year Resolution...

What's my New Year resolution? For last few days many of my friends or followers asking me rather complaining me about the disappearance of my blog. Sorry folks was going through "Writer's Block". So I took a resolution this year to update my this blog everyday. Some of the days may contain multiple posts and sometimes it can be one liner too... But I will try my level best to put some inputs on it daily... If you don't find my updates pinch me hard, nudge me harder...
 
न था कुछ तो, ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता!

हुआ जब ग़म से यूँ बेहिस, तो ग़म क्या सर के कटने का?
न होता गर जुड़ा तन से, तो ज़ानू पर धरा होता

हुई मुद्दत कि, 'ग़ालिब' मर गया, पर याद आता हैं
वह हर इक बात पर कहना, कि यूँ होता तो क्या होता?
 

Tuesday, August 11, 2009

सिर्फ़ तुम...

वो चंद लम्हे,
थे इतने हसीन...
अपनी किस्मत पर,
मुझे ना हुआ यकीन...

कौन जाने था वो ख्वाब,
या मेरे प्यार का जवाब...
तुम थे साथ मेरे,
बन कर मेरा आफताब...

हर पल कर रहे शरारत,
चेहरे पर लिए हुए नज़ाकत...
हमेशा करना फिर मेरी हिफ़ाज़त,
और मान जाना हर बात...

इतना ही बस माँगू मै,
ऐ खुदा दे दे मुझे,
उस हसीन परी का साथ,
जिसे चाहूँ मै दिन रात...

द्वारा - सौरभ बजाज

Monday, July 6, 2009

kis qadar jald badal jaate hain insaan jaana


ab ke tajdeed-e-wafa ka nahi imkaan jaana
yaad kya tujhko dilaayein tera paimaan jaana

[tajdeed-e-wafa=renewal of faith; imkaan=possibility; paimaan=oath]

yunhi mausam ki adaa dekh ke yaad aaya
kis qadar jald badal jaate hain insaan jaana

dil ye kehta hai ki shayad ho fasurdaa tu bhi
dil ki kya baat karein dil to hai naadaan jaana

[fasurdaa=sad]

hosh aaya to sabhi khwaab the reza reza
jaise udte hue auraaq-e-pareshaan jaana

[reza=piece; auraaq-e-pareshaan=torn pages]

-Ahmed Faraz

PS: image by Tom Hilton