Friday, August 1, 2008

Zindagi Ke Roop...

Nice Song with awesome lyrics...





zindagi zindagi kya tera roop hai
zindagi zindagi kya tera roop hai
tu kabhi chaanv hain aur kabhi dhoop hain
zindagi zindagi kya tera roop hai
zindagi zindagi kya tera roop hai
tu kabhi chaanv hain aur kabhi dhoop hain
zindagi zindagi

(kabhi lagti hain tu meri saheli
kabhi lagti hain tu mujhko paheli)
(kabhi lagti hain tu meri saheli
kabhi lagti hain tu mujhko paheli)
kabhi lagti hain bheed mein gungunati
kabhi lagti hain gum sum akeli
zindagi zindagi kya tera roop hai
zindagi zindagi kya tera roop hai
tu kabhi chaanv hain aur kabhi dhoop hain
zindagi zindagi

(tu hi meri dhadkan tu hi saansein
tu hi mere din hain tu hi meri raatein)
(tu hi meri dhadkan tu hi saansein
tu hi mere din hain tu hi meri raatein)
tujhe dekhne ko tarasti hain aankein
tujhe dekhana ab meri bebasi hain
zindagi zindagi kya tera roop hai
zindagi zindagi kya tera roop hai
tu kabhi chaanv hain aur kabhi dhoop hain
zindagi zindagi

Friday, July 25, 2008

Yaade

Kismat ruk gayi,
Dil ke taar toot gaye,
Wo bhi rooth gaye aur
sapne bhi toot gaye...
Baaki rahe apne khazane me
Do aansu
Yaad teri aayi aur
Wo bhi ankho se chhoot gaye...

by - Lucky...


सफलता-असफलता

टूटे सपने,
टूटे हौंसलें,
और ना जानें
क्या क्या हाहाकार हुआ...
हँसें दुश्मन,
हँसें दोस्त,
मेरी पीड़ा का
ना उन्हें आभास हुआ...
मैं ना कम था,
हँस पड़ा,
कुछ ना हुआ हों
ऐसा मैनें इज़हार किया...
और सफलता के रथ पर
चलते चलते,
कुछ असफलताओं से,
मैं सहम गया...
स्व-विश्वास हटा,
गरल उठा,
ज़िंदगी के लक्ष्य में
मानों मैं यूँ विफल हुआ...
परन्तु....
हार नहीं मानूँगा मैं,
विफलता का
हाथ नहीं थामूँगा मैं...
कभी हार,
कभी जीत,
यहीं तो ज़िंदगी की
कहानी है...
जो समझ ना सकें
इस ज़ज्बात को,
उसके शरीर मैं बहता द्रव्य
रक्त नहीं हैं पानी हैं...

~~~
द्वारा - सौरभ बजाज ~~~


Monday, July 21, 2008

मेरे मन की व्यथा...

In case your are not able to see properly use different web browser :)


मैंने कई बार लोगो को कहते हुए सुना कि आधुनिकता कि दौड़ मैं इंसान अपने आप को खोता जा रहा है, आज तक मैं इस चीज़ को नज़रअंदाज करता आ रहा था | आज जब मेरे एक सहकर्मी ने अपनी बेटी के लिए मुझसे हिन्दी विषय में कुछ सहायता करने को कहा, तो सर्वप्रथम तो मुझे अपने आप पर गर्व महसूस हुआ कि मैं अपनी राष्ट्रभाषा को जानता हूँ और मैं किसी की मदद कर सकता हूँ, परंतु इतने दिनों बाद हिन्दी लिखने मैं मुझे बहुत मेहनत करना पड़ी | मुझे शब्द ही याद नहीं आ रहे थे और मुझे यह काम बहुत ही बड़ा प्रतीत होने लगा |

आज हम लोग अँग्रेज़ी की ओर इतना ज़्यादा झुक गये है कि हम अपनी राष्ट्रभाषा से दूर होते जा रहे है | सिर्फ़ हिन्दी दिवस मना लेने से हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती है, हमें लोगों को जागरूक करना होगा उनके कर्तव्य के प्रति, अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान के प्रति | आज यदि आप किसी युवा से पूछेंगे कि वह किस लेखक के किस उपन्यास को पढ रहा है तो आप किसी भारी भरकम अँग्रेजी उपन्यास और लेखक का नाम सुनने को तैयार रहिए, यही नहीं अगर कोई भारतीय लेखक का भी अँग्रेज़ी उपन्यास हो तो भी उसे उपहास कि दृष्टि से देखा जाता है | क्या यही है हमारी राष्ट्रभाषा हिन्दी और हमारे भारतीय साहित्य का अस्तित्व ? जिस भारतीय साहित्य और भाषा को कई देशों के लोगों ने इतना सम्मान दिया, आज वहीं हमारे देशवासियो के बीच अपनी छवि खोती जा रही है | हालाँकि मैं मानता हूँ की आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए अँग्रेज़ी एक महत्वपूर्ण साधक हो गया है और मैं भी उन्ही लोगो की श्रेणी मैं सम्मिलित हू परंतु फिर भी ये मन कहीं ना कहीं कचोटता है | आज मन करता है कि मैं भी अपने राष्ट्रभाषा के उत्थान के लिए कुछ करूँ और अपने देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का कुछ अंश निर्वाह कर सकूँ |

साथ ही मैं लगा रहा हूँ वो निबंध जो मैंने कल बहुत ही जद्दोजहद के बाद लिखा है | :)